बारूद


नथुराम को, बिनलादेन को बंदूक कौन दिलाता है?
गीता नहीं, कुरान भी नहीं, फिर यह ज्ञान कहाँ से आता है?
धुँए से घिरे, लाशों से बिछे जग का स्वप्न कौन इन्हें दिखाता है?

धर्म की किताबों में नहीं न बारूद के तैखानों में।
जवाब ढूँढ के मिलते हैं तेरे मेरे ही इस मन में।

जब थमे मन से नहीं, दौड़ती आँखों से जग को हम देखते हैं।
जो मन को न भाए क्षण भर में उसे फ़ेंकते हैं।
जब तर्क नहीं अतर्क बोलों से मनुष्य की परख करें।
एक कारण में उलझ आपस में हम फ़र्क करें।
एक बोल से बँट जाएँ, जब ऐसी नाज़ुक छड़ी पर खड़े।
अपनी सीख फैलानें में, उस सीख को ही हम छोड़ चले।

याद रखें यह प्रेम भाव ही इस कुल की साज-सज्जा है।
अलग बँटते हैं जब हम तो यह रोता है यह जलता है।

जब अगली बार गणतंत्र दिवस पर देखो उस तोप को तुम..
तो सलाम करो उस जज़्बात को भी,
पर भूलो मत याद करो कारगिल की उस रात को भी।
एकता से खड़े रहो बात-बात पर बँटो नहीं।
चर्चा करो, समझो हर पक्ष को, बात-बात पर लड़ो नहीं।